जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने किए मां नंदा के दर्शन, 2026 में होने वाले ‘हिमालय के महाकुंभ’ श्री नंदा देवी बड़ीजात/राजजात का निमंत्रण किया स्वीकार

कुरुड़ (नन्दानगर)। नन्दानगर वासियों के लिए आज का दिन बेहद हर्ष, उल्लास और परम सौभाग्य का रहा। ज्योतिषपीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य श्री स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती महाराज जी का पावन आगमन नन्दाधाम कुरुड़ में हुआ। शंकराचार्य जी के आगमन पर स्थानीय जनता, मंदिर समिति और प्रबुद्ध जनों द्वारा उनका भव्य और पारंपरिक स्वागत किया गया।
मां नंदा देवी सिद्धपीठ में विधि-विधान से पूजा-अर्चना
धाम पहुँचने के बाद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती महाराज जी ने सुप्रसिद्ध मां नंदा देवी सिद्धपीठ मंदिर, कुरुड़ में मां नंदा भगवती के दिव्य दर्शन किए। इस दौरान पूजनीय गौड़ पुजारियों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण और पूर्ण विधि-विधान के साथ विशेष पूजा-अर्चना संपन्न कराई गई। शंकराचार्य जी ने जगत कल्याण और संपूर्ण क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।
‘बड़ीजात 2026’ का निमंत्रण पत्र स्वीकार, दिया प्रतिभाग का आश्वासन

इस पावन अवसर पर मंदिर समिति और स्थानीय गणमान्य व्यक्तियों द्वारा शंकराचार्य जी को आगामी 05 सितंबर से 30 सितंबर 2026 तक आयोजित होने वाली ऐतिहासिक व अलौकिक ‘श्री नंदा देवी बड़ीजात/राजजात’ का पावन निमंत्रण पत्र भेंट किया गया। शंकराचार्य जी ने सहर्ष इस निमंत्रण को स्वीकार करते हुए इस भव्य यात्रा में प्रतिभाग करने का पूर्ण आश्वासन दिया, जिससे समस्त क्षेत्रवासियों और नंदा भक्तों में भारी उत्साह है।
क्या है श्री नंदा देवी राजजात/बड़ीजात (हिमालय का महाकुंभ)
श्री नंदा देवी राजजात (या बड़ीजात) उत्तराखंड की सबसे प्रतिष्ठित, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक देव-यात्रा है, जिसे “हिमालय का महाकुंभ” भी कहा जाता है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अटूट लोक-आस्था, संस्कृति और भूगोल का जीवंत प्रतीक है।
- पौराणिक महत्व (विदाई की भावुक यात्रा): हिंदू मान्यताओं के अनुसार, मां नंदा (पार्वती) को उत्तराखंड की बेटी (ध्याण) माना जाता है। यह यात्रा मूल रूप से मां नंदा की अपने मायके से ससुराल (कैलाश) जाने की एक बेहद भावुक विदाई यात्रा है। आम तौर पर यह विशाल यात्रा प्रत्येक 12 वर्ष में एक बार आयोजित होती है।
- यात्रा का मुख्य आकर्षण (चौसिंग्या खाडू): इस पूरी यात्रा का नेतृत्व एक अनोखा जीव—चौसिंग्या खाडू (चार सींगों वाला नर भेड़) करता है। यात्रा शुरू होने से ठीक पहले यह भेड़ रहस्यमयी तरीके से मिलती है, जिसकी पीठ पर मां के आभूषण और छंतोली बांधी जाती है। अंतिम पड़ाव होमकुंड पहुंचकर यह खाडू खुद-ब-खुद कैलाश की ओर बढ़ जाता है।
- कठिन और अलौकिक मार्ग: यह यात्रा चमोली जिले के माँ नंदा धाम कुरुड़ से शुरू होकर लगभग 280 किलोमीटर से अधिक की अत्यंत कठिन पैदल दूरी तय करती है। यात्रा खूबसूरत बेदनी बुग्याल, रहस्यमयी कंकाल झील ‘रूपकुंड’ (16,500 फीट) और खतरनाक ‘ज्यूरगली दर्रे’ को पार करते हुए त्रिशूल पर्वत की तलहटी में स्थित होमकुंड तक पहुंचती है।
इस ऐतिहासिक क्षण पर गरिमामयी उपस्थिति
शंकराचार्य जी के आगमन और इस पावन निमंत्रण के साक्षी बनने के लिए कई राजनैतिक, सामाजिक और प्रशासनिक हस्तियां मौजूद रहीं। कार्यक्रम में मुख्य रूप से:
- डॉ॰ शुभ प्रसाद पांडे जी
- अतुल शाह जी,
- श्री देवेंद्र नेगी जी,
- श्री पुंडीर जी
- भाजपा मंडल अध्यक्ष: श्री कृपाल सिंह बिष्ट जी
- मन्दिर समिति के अध्यक्ष: श्री सुखबीर रौतेला जी
- किसान मोर्चा के जिलाध्यक्ष: देव सिंह नेगी जी
- क्षेत्र पंचायत सदस्य: देवेश्वरी गौड़ जी
- कुरूड़ ग्राम प्रधान: हेमा गौड़ जी
इसके साथ ही हीरा सिंह बिष्ट जी, कैप्टन भागवत बिष्ट जी, कैप्टन करण सिंह बिष्ट जी, पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी जी, श्री कन्हैया प्रसाद गौड़ जी, योगेश्वर प्रसाद गौड़ जी, श्री मुंशी चंद जी, श्री दिनेश गौड़ जी, श्री जनार्दन गौड़ जी, श्री राकु गौड़ जी, श्री सूरज गौड़ जी, श्री बच्ची राम गौड़ जी, श्री अशोक गौड़ जी सहित तहसील व पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारीगण और सैकड़ों सामाजिक कार्यकर्ता व श्रद्धालु उपस्थित रहे।
शंकराचार्य जी के इस प्रवास और आशीर्वाद से संपूर्ण क्षेत्र मां नंदा भगवती के जयकारों से गुंजायमान रहा।